कहा जाता हैं, जहाँ मुर्ख रहते है वहाँ बुद्धिमानो को खाने की चिंता नहीं रहती हैं। और वैसे मैंने देखा भी है। मैं गाँव में ही पड़ रहा हूँ। उन दिनों के मेरे दोस्त था अभिमन्यु मगर वह सच्चा इंसान होने के साथ साथ चापलूस भी कम न था। मैं मैट्रिक, पास करने के बाद पटना में नाम लिखवा लिया। लेकिन अभिमन्यु की आर्थिक स्थिति ठीक न रहने के कारण आगे न पढ़ सका। मेरा भी आर्थिक स्थिति कोई खाने का ठीक न था फिर भी मैं जैसे तैसे आगे रहा था। एक बार काॅलेज में छुट्टी हो जाने पर मैं घर गया जब छुट्टिया बीत गयी तो अभिमन्यु भी मेरा साथ आना चाहता था। वह पटना कभी नहीं आया था अत: वह राजधानी घूमना चाहता था। मुझे भला इसमे क्या आपत्ति थी मैं उसको साथ लाने के लिए तैयार हो गया। तय हुआ की मैं वहाँ पर रुक जाऊंगा और ये घूम फिर कर चला आयेगा। नियत दिन हमलोग गाड़ी में सवार होकर चले। मेरे पास केवल दो समान था एक अटैची और एक भरा बोरा। मेरा अटैची खाली थी। तथा अभिमन्यु का समान उसी मैं रखवा लिया, पटना, स्टेशन पर पहुंचकर मुझे अपने समानो की चिंता समा गयी। अभिमन्यु अपने स्थान पर बेखबर सो रहा था। कुछ देर पहले मैं भी सो रहा था मगर गाड़ी रुकने पर धक्का लगने के कारण जाग गया था। गर्मी का मौसम ऐसा ही आलाश भरा होता है।
वैसा विरला ही हो गया जिसे सफर के दौरान नींद न आये। और यही नींद मेरे लिए घातक हुआ। सच है` जो जागे सो पावे, जो सोवे सो खोबे। बोरा तो सही सलामत था लेकिन अटैची के बारे में पूछा। उसने अनभिज्ञाता प्रकट करते हुए कहा कि मैं तो यही रख दिया था। मैं आनन फ़ानन मै सारे डब्बा छान मारा अटैची नही मिले। निराश हो मैं अभिमन्यु बोरा लेकर प्लेटफर्म पर उतर गये। हमलोग भारी मन से डेरा आ गए। मन में सोचा जो हुआ सो हुआ अब तो घर लौटना ही पड़ेगा। क्योंकि मेरे पाँच सौ रुपये और कुछ कपड़े और अभिमन्यु के दो सौ रुपये उसी अटैची मैं था। अब मेरे पास सिर्फ पचास रुपये ही बचे थे। डेरा जाकर हमलोग स्नानं किया और झटपट खिचड़ी बना डाली और दोनो दोस्त खाकर आराम करने लगे। थोड़ी देर आराम करने के बाद मैंने अभिमन्यु से कहा - चलो तुम्हे गोलघर दिखा कर लाते हैं। वह मेरे साथ चलने लगा वह बहुत ही उदास नजर आ रहा था। मैंने उसे समझना चाहा- जाने दो ऐसा तो होता ही रहता है। वह मुस्कुराकर कहा- नही अब मैं यह सोच रहा हूँ की इस शहर में जितना पैसा खोया उसे कैसे वसूला जाय। उसकी इस बात को सुनकर मुझे जोरों की हंसी आये। मगर वह कुछ न बोला। जब वह गोलघर की सीढ़ी पर चढ़ रहा था। तो बहुत उलझन में थे। मगर मैंने देखा ऊपर जाने के बाद वह प्रसन्न हो गया। थोड़ी देर में हम वहा से उतर गये। अभिमन्यु उतरकर सबसे पहले पकेट से पलिथिन निकाला और मिट्टी बटोरकार वह उसमे रखने लगा गोलघर के बाहर कैम्पस में लोग को आते जाते वहा के मिट्टी एकदम पौडर जैसा हो गया था।
मैं शर्म के मारे उसके पास खडा न हो सका। और किनारे जाकर खड़ा हो गया। वह इत्मिनान से मिट्टी पलेथिं मे उठाकर नल पर हाथ धोया और पालिथिन उठाये मेरे पास चला आया। मैंने उसकी इस मूर्खतापूर्ण हरकत के बारे में पूछा तो उसने कहा कि बस तुम चुपचाप देखते जाओ मैं कैसे रुपया वसूलता हु। उसने डेरा आते वक़्त एक किलो अखबार खरीद लिया। डेरा पहुंचकर मैं पड़ने मै जुट गया और वह अपने रोजगार मे मगर मैं उसकी हर एक हरकत को देख रहा था मै माँ ने मुझे थोड़ा सा सत्तु एक पोटली मैं बांधकर दी थी। वह उसी कपड़े से मिट्टी को छान रहा था। वह लगभग उस मिट्टी को एक हजार पुरियो मैं बाँट दिया और रख दिया। उसके बाद हमलोग खाना बनाने लगे।
दूसरे दिन मैं उसे स्टेशन पर लेकर गया। वह स्टेशन के बाहर एक जगह पर वह बेग जिसमे पुड़िया रखी थी। रख दिया। वहां वह एक संतरे मे फाईब स्टार अगरबत्ती खोँचकर जला दिया। उसे वैसा करते देख कुछ लोग इर्द गिर्द जमा हो गये। मैं भी उसी भीड़ में खड़ा होकर तमाशा देख रहा। तब उसने होकर कहना शुरू किया। भाईयो मेरा नाम अनिल है। शायद मैं आपलोगो के लिए अपरिचित हु। आज के जमाने में लोग तंत्र मंत्र सिद्ध कुछ नहीं मानता है कुछ पल रुकर फिर जोर से बोला।।मगर मैं कहता हूं जो लोग नही मानते, उन्हे मानना चाहिए। आज भी आपको पहाड़ों कंदराव हजारो साल से तापस्या मै लिन साधु महात्मा मिल जायेंगे। उसका भाषण सुनकर कुछ लोग जमा हो गया और कुछ लोग जाने लगे। तब वह तुरंत बोला- मेरे पास एक चमत्कारी चीज है। मैं उसे दिखाऊँगा और बताऊंगा की वह क्या है, जिसे आपलोग रोज़ देखते हैं और वह चीज हर समय आपकी आँखो के सामने रहती हैं। कुछ लोग जो जा रहे थे, उनका भी पाँव रुक गया। वह फिर बोला मेरी सेवा निर्थक नही जायेगी। यह मुझे विश्वास है, एकाएक वह मायूस हो गया उसके आँख छलक आये। मैं सत्बधा सा होकर खड़ा था। चार साल पहले की बात है।
मेरी माँ को गठिया रोग का बहुत इलाज कराया मगर कुछ फायदा नही हुआ। वह रात- दिन दर्द से चिल्लाती रहती थी। तब तक उसके आँसू गाल पर लुढ़क आये थे। उसे इस तरह हालत में देखकर कुछ और लोग जमा हो गया। मगर मैंने हार नही माना मैंने सुना था कोई पहाड़ के गुफा में एक साधु महात्मा रहते थे। मैंने वही जाने को ठान लिया और पहुँच गया भैरों बाबा के चरण में। बस बाबा ने एक चुटकी मिट्टी उठाकर दिया और कहा- जाओ बच्चा और चमत्कार हो गया सिर्फ चौबीस घंटे में माँ बिल्कुल चँगा हो गयी। उसी दिन से मैंने यह ठान लिया था कि बाबा का यह प्रसाद मैं जन- जन तक पहॅुचाऊँगा। मैं मुंबई, मद्रास, दिल्ली, जैसे शहर में गया और यह प्रसाद वहा बँटा। अब मैं पटना में यह प्रसाद बाँट रहा हूँ। इसकी सबसे बड़ी खुशी यह है कि यह परत्येक रोग मै काम देता है और फिर मेरे पीछे भी तो परिवार है।, मेरे दो बच्चे एक बुढी माँ और एक पत्नी है। इसलिए इस दवा के दाम मात्र एक रुपए। अचानक उसके कहने के लहजे में परिवर्तन आया अरे साहब एक रुपया तो आपलोग सड़को पर पान खाकर ठुक देते है। एक रुपया कोई बड़ी चीज नहीं है। भाईजान यह दावा विश्वास का है। आप मुझ पर भरोषा रखिये। एक इंशान ही एक इंशान पर भरोसा रख सकता हैं। मैं अब तक जो उसका भाषण सुन रहा था बोला भाईजी सबेरे मैं साइकिल से गिर गया था।
जिससे यहाँ का चम्रा छिल गया है, मैंने उसे हाथ दिखाते हुए कहा। आप थोड़ा सा दबा यहाँ दीजिये। उसने बैग खोलकर एक पुड़िया निकाला और उसे खोलकर थोड़ी मिट्टी घाव पर लगा दिया। मै जब गाँव में ही था तब साइकिल से गीरा था। लेकिन इस घाव को मैं आज फिर ताजा कर दिया था। मिट्टी वहाँ लगाते ही खून बंद हो गया। अरे वाह मैं चीखा। मैं पॉकेट से एक सिक्का निकाला और कहा भाईजी पहले मुझे दे दो। उसने एक पुड़िया दे दिया। मैं जैसे दावा लेने का आग्रज था। मेरे लेते ही दस दवा पर लोग टूट पड़े। कोई दस पुड़िया माँग रहा है और कोई पाँच इस प्रकार अभिमन्यु पुरा मिट्टी बेच दिया। और वह भी सिर्फ़ Ek घंटे में।
अब मैं समझा मुझे घाव ताजा करने का नाटक क्यो करने कहा था। मैं मन ही मन सोच रहा था यह व्यक्ति कभी भी मुर्ख नही हो सकता है। दोपहर तक हमलोग डेरे मै आ गये। मिट्टी बेचकर कुल नौ सौ ग्यारह रुपये आये। दवा बेचते हुए वह बीच- बीच से एक दो पुड़िया रिक्शा चालक भिखमंगे को भी मुफ्त में दे देता था। उसके बाद वह मुझे साढ़े चार सौ रुपये देते हुए कहा- यह लो, तेरा मूल का ब्याज मैंने काट लिया है और फिर हम दोनो हँस पड़े और खाना पाकाके दोनो खाना खाये और सो गये।






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